लघुकथा : माँ की उपयोगी सीख


‘माँ की उपयोगी सीख’ विषय पर एक लघुकथा लिखिए।


दस-बारह साल की मीनल बचपन से जयपुर या दिल्ली के किसी बड़े, नामी कॉलेज के छात्रावास में रहकर पढ़ने की सोचा करती थी। उसके परिवार में माँ-पापा के अलावा एक छोटा भाई मोहित था। पिता एक सरकारी नौकरी करते थे। उसका खुशहाल परिवार था। मीनल पढ़ाई में तो ठीक – ठाक थी लेकिन घर के कामों में मदद करने के लिए माँ का टोकना उसे पसंद नहीं आता था। वह स्कूल से घर आने के बाद अपने कपड़े, जूते, किताबें आदि भी उचित स्थान पर रखती थी। माँ अकसर उसे समझाया करती लेकिन उसकी समझ में कुछ न आता। मीनल ने स्कूल की पढ़ाई पूरी करके जयपुर के किसी कॉलेज में दाखिले की जिद की। उसकी जिद पर पिताजी ने जयपुर के एक कॉलेज में उसे दाखिला दिलवाया और वहीं छात्रावास में उसके रहने का सारा इंतजाम कर दिया। मीनल जाते समय बहुत खुश थी। लेकिन कुछ ही दिनों में सारी असलियत उसके सामने आ गयी। छात्रावास में उसे सुबह उठकर स्वयं चाय बनानी होती, कमरे की सफाई करनी होती और अपने कपड़े भी धोने पड़ते। जबकि घर पर तो माँ कर देती थी। छात्रावास में छात्रों को सुबह जागने, प्रार्थना, कसरत, भोजन आदि के लिए बनाए गए नियमों का भी पालन करना होता। वहाँ मीनल को घर की बहुत याद सताने लगी। वहाँ कॉलेज से भी उसे काफी कार्य मिलता और वहाँ कोई मदद करने वाला भी नहीं था। वह उस बड़े शहर में अनजान थीं अतः कहीं घूमने भी नहीं जा पाती थी और छात्रावास के खाने में भी माँ के हाथ जैसा स्वाद नहीं था। तव मीनल को समझ आया कि माँ की बातें कितनी सही थीं जिन्हें वह न सुनना पसंद करती थी, न समझना चाहती थी। अब वह वास्तविकता को समझ पा रही थी। अब उसे माँ की दी हुई सीख उपयोगी लग रही थी।

सीख : परिवार या समाज के नियमों का पालन करना हमारे जीवन के लिए के लिए उपयोगी सिद्ध होता है।